खता हो गयी आज, के दिल फिर उदास है
लफ्ज़ फिर खुले नही, कहने को संसार है
दिल भी न टूटे, वो भी न रूठे
कह दो कुछ ऐसा, के रूठा फिर तैयार है
रात के हथेली पे, चाँद ढूंढने फिरा
रुक गए कदम, जब यार सामने मिला
हम भी न बोले, वो भी न बोले
पर कहा सुना बहुत कुछ, जो आँखों से बयां है
साथ थे किसी ज़माने में हम, तब दिल का आशियाँ सजा रखा था
ख्वाबों के घरोंदों में सपनो को सजा रखा था
वो टूट गए तो क्या हुआ, वो दूर हुए तो क्या हुआ
अब बस मैं और तन्हाईयाँ है, उन्ही से दिल लगा रखा है
दिल के राही हम है निकले, चाहत के बाज़ार में
सपने थे, सच करने थे, जो टूट गए हर हाल में
नयी कहानी के नए पात्र फिर आएंगे इस द्वार से
हम तो बस यही कहेंगे, ना जा इस अंधकार में
..........स्नेहा स्वरुप
Wednesday, April 7, 2010
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