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Wednesday, April 7, 2010

khata

खता हो गयी आज, के दिल फिर उदास है
लफ्ज़ फिर खुले नही, कहने को संसार है
दिल भी न टूटे, वो भी न रूठे
कह दो कुछ ऐसा, के रूठा फिर तैयार है

रात के हथेली पे, चाँद ढूंढने फिरा
रुक गए कदम, जब यार सामने मिला
हम भी न बोले, वो भी न बोले
पर कहा सुना बहुत कुछ, जो आँखों से बयां है

साथ थे किसी ज़माने में हम, तब दिल का आशियाँ सजा रखा था
ख्वाबों के घरोंदों में सपनो को सजा रखा था
वो टूट गए तो क्या हुआ, वो दूर हुए तो क्या हुआ
अब बस मैं और तन्हाईयाँ है, उन्ही से दिल लगा रखा है

दिल के राही हम है निकले, चाहत के बाज़ार में
सपने थे, सच करने थे, जो टूट गए हर हाल में
नयी कहानी के नए पात्र फिर आएंगे इस द्वार से
हम तो बस यही कहेंगे, ना जा इस अंधकार में
..........स्नेहा स्वरुप

4 comments:

  1. SO NICE POEM........
    TO BE CONTINUED !!!!!!!
    & THANX FOR BEING MY FRND....

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  2. good one..though i have heared it from you already but still a good one....

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  3. @Kanhaiya: thanx for praising my poem...and no need to thank me.

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  4. @Arvind sir: thanx a lot sir...i alwaz welcome sm suggestions frm u.

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